किस-किस को याद कीजिए
किस किस को रोइए
आराम बडी चीज़ है
मुंह ढांप के सोइए
पढा जब यह स्लोगन सामने की दीवार पर
दस्तक सी बज उठी जहन के द्वार पर
उमड़ उमड़ निकल चला विचारों का कारवां
सोचती हूं कैसे करूं इसे मैं बयां
जी तो बहुत करता है कि सो जाउं मैं
मीठे हसीन खवाबों में खो जाउं मैं
हर तरफ़ हों गूंजती शहनाइयां
न कहीं भी हो कोइ तन्हाइयां
हर गली कूचा हो खुशियों का चमन
न कहीं भी हो कोइ रुस्वाइयां
हम वतन हम सभी मिलकर रहें
बीच में ना हो धरम की खाइयां
किन्तु फिर ये विचार आया–
कब तक यूं खुद को सुलाती रहूं मैं
याद कुछ भी ना रखूं भुलाती रहूं मैं
नहीं भुलां सकती बापू की उस लाठी को
एक सूत्र में बांधा जिसने भारतवासी को
कैसे भूलूं लाजपतराय निर्दोष को
लहू मांगते सुभाषचन्द्र बोस को
भूलना चाहू भुला न पाऊं
वीरो की उस टोली को
चूम के चढ़ गये फ़ांसी
उस बसंती रंगोली को
कैसे भूलूं शहीद के उस दूध पीते बच्चे को
क्या समझाएं इस रोते हुए सीधे और सच्चे को
मत रो बेटा तू भी वतन के गीत गाएगा
तेरा सीना भी गर्व से उंचा होगा
जब शहीद का बेटा कहलाएगा
कैसे भूलूं प्रताडित होती उस नारी को
रोती बिलखती आहें भरती उस अबला बेचारी को
आज बेशक हमारे पांव चांद सितारों पे पड़ गये
इन्सानियत की राह मे लेकिन पिछ्ड गए
कैसे भूलूं आतंक के उस हमले को
मार गिराया आतंकियों के उस अमले को
वीर शहीद हुए अपने भी
टीस सी उटती है कह्ते हुए इस जुमले को
भूलना ही है तो -
आओ भुला दें आपस के मतभेदों को
आओ भुला दें अप्नी इन द्वेशों को
देखों मेरी भारत माता देती आशीर्वाद है
सबसे पहले मेरा भारत बाकि सब उसके बाद है
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अप्रैल 12, 2011 को 3:41 अपराह्न पर |
बेहतर…